September 11, 2026

Not Democracy, But a Reign of Fear: Modi Government Silenced Parliament and Brutalized Student Protesters


संसद के भीतर बहस नहीं, सड़क पर आँसू गैस. क्या यही है “नया भारत”?

जब किसी लोकतंत्र में छात्र अपनी परीक्षा की निष्पक्षता मांगें, बेरोज़गार युवा अपना भविष्य मांगें, सामाजिक कार्यकर्ता भूख हड़ताल करें, और सत्ता का जवाब हो लाठीचार्ज, आँसू गैस, गिरफ्तारियाँ और संसद स्थगित… तब सवाल केवल NEET का नहीं रह जाता. सवाल पूरे लोकतंत्र का हो जाता है.

21 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को अस्पताल भेज दिया गया. जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों पर आँसू गैस छोड़ी गई. विपक्ष ने संसद में चर्चा की मांग की, लेकिन संसद बहस का मंच बनने के बजाय शोर और स्थगन का प्रतीक बन गई.

क्या यही लोकतंत्र है? या फिर भारत धीरे-धीरे एक ऐसे शासन मॉडल की ओर बढ़ चुका है जहाँ सरकार जवाब देने के बजाय विरोध करने वालों को ही अपराधी घोषित कर देती है?


NEET घोटाला सिर्फ परीक्षा नहीं, करोड़ों युवाओं के सपनों की हत्या है

हर साल लाखों छात्र अपनी पूरी जवानी दांव पर लगाकर NEET की तैयारी करते हैं. परिवार कर्ज़ लेते हैं. माता-पिता अपनी बचत खत्म कर देते हैं.

लेकिन जब बार-बार पेपर लीक होते हैं, परीक्षा रद्द होती है, पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं और फिर सरकार कहती है कि “सब ठीक हो गया”, तो सबसे बड़ा मज़ाक उन्हीं छात्रों के साथ होता है.

क्या केवल परीक्षा दोबारा करा देना न्याय है?

क्या मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान और खोया हुआ समय वापस आ जाएगा?

सरकार ने कभी इस सवाल का जवाब नहीं दिया.


मोदी सरकार का नया मंत्र: सवाल पूछो, लाठी खाओ

लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है.

लेकिन आज तस्वीर उलटी दिखाई देती है.

  • छात्र सवाल पूछें तो पुलिस.
  • किसान आंदोलन करें तो बैरिकेड.
  • पत्रकार सवाल पूछें तो मुकदमे.
  • सामाजिक कार्यकर्ता अनशन करें तो अस्पताल भेज दो.
  • विपक्ष चर्चा मांगे तो संसद स्थगित.

यानी समाधान नहीं, केवल दमन.

सरकार शायद भूल चुकी है कि लोकतंत्र पुलिस की लाठी से नहीं बल्कि जनता के विश्वास से चलता है.


संसद आखिर चल किसके लिए रही है?

संसद का उद्देश्य कानून बनाना और जनता के मुद्दों पर चर्चा करना है.

लेकिन मॉनसून सत्र के पहले ही दिन क्या हुआ?

विपक्ष NEET और अन्य मुद्दों पर चर्चा चाहता था.

सरकार चर्चा से बचती रही.

दोनों सदन बार-बार स्थगित होते रहे.

अगर देश के सबसे बड़े परीक्षा घोटाले पर संसद में चर्चा नहीं होगी, तो फिर संसद किसलिए है?

क्या संसद केवल सरकार की उपलब्धियों का मंच बनकर रह गई है?


विरोध करने वाला हर नागरिक “देशद्रोही” क्यों बना दिया जाता है?

पिछले कुछ वर्षों में एक खतरनाक प्रवृत्ति विकसित हुई है.

जो सरकार से असहमत है…

उसे राष्ट्रविरोधी.

जो सवाल पूछे…

उसे विपक्ष का एजेंट.

जो प्रदर्शन करे…

उसे अराजक तत्व.

यह लोकतंत्र नहीं, राजनीतिक असुरक्षा की निशानी है.

मजबूत सरकार सवालों से नहीं डरती.

कमज़ोर सरकार सवाल पूछने वालों से डरती है.


शिक्षा व्यवस्था का राजनीतिक अपहरण

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है.

लेकिन शिक्षा व्यवस्था लगातार संकट में है.

  • पेपर लीक.
  • भर्ती घोटाले.
  • वर्षों तक खाली सरकारी पद.
  • परीक्षा रद्द.
  • परिणामों पर विवाद.
  • छात्रों का मानसिक अवसाद.

इन समस्याओं का समाधान नीति से होना चाहिए.

लेकिन सरकार का ध्यान समस्या हल करने से अधिक अपनी छवि बचाने में दिखाई देता है.


“सब ठीक है” वाली राजनीति सबसे बड़ा झूठ है

जब लाखों छात्र सड़क पर हों…

जब सामाजिक कार्यकर्ता भूख हड़ताल पर हों…

जब विपक्ष संसद में चर्चा मांग रहा हो…

जब पुलिस प्रदर्शनकारियों पर आँसू गैस छोड़ रही हो…

तब यह कहना कि “मुद्दा समाप्त हो चुका है” केवल संवेदनहीनता नहीं बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से भागना है.

समस्या खत्म नहीं होती.

सिर्फ़ दबा दी जाती है.

और दबाई गई समस्याएँ एक दिन विस्फोट बनकर लौटती हैं.


सत्ता का अहंकार लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन

इतिहास गवाह है.

हर वह सरकार जिसने जनता की आवाज़ दबाने की कोशिश की…

आखिरकार जनता के सामने झुकनी पड़ी.

लोकतंत्र में सरकारें स्थायी नहीं होतीं.

जनता स्थायी होती है.

आज छात्रों की आवाज़ दबाई जा सकती है.

कल वही छात्र वोटर बनेंगे.

और लोकतंत्र में आख़िरी फैसला पुलिस नहीं…

जनता करती है.


भारत को प्रचार नहीं, जवाबदेही चाहिए

देश को भाषणों से ज्यादा पारदर्शिता चाहिए.

PR अभियान से ज्यादा निष्पक्ष परीक्षा चाहिए.

इवेंट मैनेजमेंट से ज्यादा जवाबदेह संस्थाएँ चाहिए.

लोकतंत्र का मतलब यह नहीं कि हर पाँच साल में वोट डाल दिया जाए.

लोकतंत्र का मतलब है कि नागरिक बिना डर के सरकार से सवाल पूछ सके.

और सरकार बिना पुलिस के जवाब दे सके.


निष्कर्ष

आज का भारत एक कठिन मोड़ पर खड़ा है.

एक रास्ता लोकतंत्र का है, जहाँ बहस होगी, जवाबदेही होगी और छात्रों की आवाज़ सुनी जाएगी.

दूसरा रास्ता दमन का है, जहाँ हर विरोध को कानून-व्यवस्था का मुद्दा बनाकर दबा दिया जाएगा.

सरकार को तय करना होगा कि वह लोकतांत्रिक गणराज्य चलाना चाहती है या भय का ऐसा वातावरण जहाँ नागरिक अपने ही अधिकार मांगने से डरने लगें.

क्योंकि इतिहास यह याद नहीं रखता कि सत्ता कितनी शक्तिशाली थी.

इतिहास यह याद रखता है कि सत्ता ने अपने ही युवाओं, छात्रों और नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार किया.


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